और अक्रामक हो भारतीय विदेश नीति, दक्षिण ऐशियाई देशों के साथ भारत के संबंधों पर नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता !

और अक्रामक हो भारतीय विदेश नीति, दक्षिण ऐशियाई देशों के साथ भारत के संबंधों पर नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता !
क्या भारत को अपनी विदेश नीति में और आक्रामकता लाने की जरूरत है? यह सवाल आज इसलिए प्रासंगिक हो चला है क्योंकि हाल के दिनों में भारतीय विदेश नीति को बड़ी चुनौतीयां मिल रही है। भारत को विशेष तौर पर दक्षिण एशियाई देशों के साथ उसके संबंधों पर नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता है।
हालिया दिनों में जिस तरह लद्दाख के गलवान घाटी में भारतीय और चीनी फ़ौजें आमने सामने आ गई इससे दोनों देशों में तनाव बढ़ना लाजमी था। इस तनावपूर्ण स्थिति का कारण खुद चीन ही है। भारत ने कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के बीच चीनी करतूत का सैन्य और कूटनीतिक मोर्चे के इस्तेमाल से करारा जवाब दिया।
भारत ने साफ-सफ शब्दों में ये दिखा दिया है की भारत की विदेश नीति किसी भी तरीके के दबाव में नही आने वाली। प्रधानमंत्री मोदी ने आत्मनिर्भर भारत के संदर्भ में मेक इन इंडिया मेड फ़ॉर वर्ल्ड का जो बिगुल फूंका है उससे आने वाले दिनों में भारत की विदेश नीति को और धार मिलेगी। चीन की नीयत हमेशा से प्रश्नचिन्ह खड़ा होता रहा है। हांग- कांग, ताइवान और दक्षिण चीन सागर में वियतनाम को लेकर चीन की रणनीति में बदनीयती किसी से छिपी नही है।
भारत को अफगान-तालिबान वार्ता पर भी कड़ी नजर रखनी चाहिये। भारत ने अफगानिस्तान के विभिन्न क्षेत्रों में बड़ा निवेश किया है। अगर अमेरिकी फौजें अफगानिस्तान से वापस चली जातीं है तो तालिबान का अफगानी राजनीति में आना तय है। तालिबानी पूरे तरीके से इस्लामवाद से ग्रसित है लिहाजा भारत के प्रति उनका रवैया संदेह के घेरे में है। परिणामस्वरूप, अफगानिस्तान में चल रहे बड़े बड़े भारतीय प्रोजेक्ट्स को झटका लगना भी तय है। अफगान-तालिबान वार्ता में पाकिस्तान की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
यहां पाकिस्तान की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण होगी। अफगान-तालिबान गठजोड़ भारत मे घुसपैठ और आतंकी वारदातों को बड़े पैमाने में अंजाम दे सकते हैं। ऐसी दशा में भारत को अपने विदेश नीति को और अक्रामक बनाने के साथ-साथ और अधिक गहनता से विचार करने की आवश्यकता है।
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